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देवउठनी एकादशी | AstronKundali

देव उठनी एकादशी

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। वर्षभर में चौबीस एकादशियाँ आती…

देवउठनी एकादशी
  • ashish nishad
  • Nov 02, 2025

देवउठनी एकादशी

देव उठनी एकादशी

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। वर्षभर में चौबीस एकादशियाँ आती हैं, जिनमें से देव उठनी एकादशी (जिसे प्रबोधिनी एकादशी या देवोत्थान एकादशी भी कहा जाता है) अत्यंत शुभ मानी जाती है। यह एकादशी कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है और इसे भगवान विष्णु के चार महीने के शयन काल के समाप्त होने का प्रतीक माना जाता है।

देव उठनी एकादशी का धार्मिक महत्व
देव उठनी एकादशी को “देवोत्थान” इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं। ये चार महीने देवशयनी एकादशी (आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी) से लेकर देव उठनी एकादशी तक माने जाते हैं। इस अवधि को “चातुर्मास” कहा जाता है, जिसमें शुभ कार्य जैसे विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ आदि नहीं किए जाते।

जब भगवान विष्णु इस दिन जागते हैं, तब से पुनः सभी शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। इसलिए इस एकादशी को शुभ कार्यों के आरंभ का दिवस माना जाता है।

पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु ने देवताओं और समस्त सृष्टि को विश्राम देने के लिए क्षीरसागर में चार महीने तक योगनिद्रा धारण की थी। इस दौरान समस्त देवता और देवीगण विश्राम में रहते हैं। चार महीने बाद जब कार्तिक मास की शुक्ल एकादशी आती है, तब लक्ष्मी माता भगवान विष्णु को उठाती हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।

एक अन्य कथा के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विवाह भी होता है, इसलिए इस दिन अनेक स्थानों पर तुलसी विवाह भी संपन्न किया जाता है।

देव उठनी एकादशी की पूजा विधि
प्रातः स्नान और संकल्प: प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।

व्रत: इस दिन उपवास रखकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। जल या फलाहार पर व्रत किया जा सकता है।

पूजन विधि:

भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति स्थापित करें।

पंचामृत से स्नान कराकर तुलसी दल, पीले पुष्प, दीपक और नैवेद्य अर्पित करें।

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।

तुलसी विवाह: शाम के समय भगवान विष्णु (शालिग्राम) और तुलसी माता का विवाह विधिपूर्वक संपन्न किया जाता है।

आरती और कथा श्रवण: देव उठनी एकादशी की कथा सुनना और आरती करना शुभ माना गया है।

देव उठनी एकादशी व्रत का फल
शास्त्रों में कहा गया है कि देव उठनी एकादशी का व्रत करने से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत सौभाग्य, समृद्धि और वैवाहिक जीवन में सुख प्रदान करने वाला माना गया है।

देव उठनी एकादशी से जुड़े प्रमुख कार्य
तुलसी विवाह

भगवान विष्णु की विशेष पूजा

विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ, संस्कार जैसे शुभ कार्यों की शुरुआत

मंदिरों में भगवान विष्णु की आराधना और भजन-कीर्तन

समापन
देव उठनी एकादशी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सृष्टि के नवचैतन्य का प्रतीक है। यह दिन यह संदेश देता है कि विश्राम के बाद पुनः कर्म और सृजन का आरंभ करना ही जीवन का धर्म है। इस दिन श्रद्धा, भक्ति और संयम के साथ व्रत करने से व्यक्ति को ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है और उसके जीवन में सुख-समृद्धि का संचार होता है।

क्या आप चाहेंगे कि मैं इसमें तुलसी विवाह की पूरी विधि और कथा भी जोड़ दूं ताकि लेख और पूर्ण हो जाए?

तुलसी विवाह की कथा और विधि (देव उठनी एकादशी विशेष)

तुलसी विवाह का महत्व
देव उठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के जागरण के साथ ही शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। इसी दिन तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है, जिसे वैकुंठ विवाह भी कहा जाता है। इस विवाह में तुलसी माता (पृथ्वी पर भगवान विष्णु की प्रिय वृक्ष स्वरूपा देवी लक्ष्मी) का विवाह शालिग्राम भगवान (विष्णु स्वरूप) से कराया जाता है।
हिंदू परंपरा में यह विवाह उतना ही पवित्र और शुभ माना जाता है जितना किसी कन्या का वास्तविक विवाह। ऐसा माना जाता है कि तुलसी विवाह से जोड़े गए यजमान को पुत्र-पौत्र, सौभाग्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

तुलसी विवाह की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु की प्रिय भक्त वृंदा नाम की स्त्री अपने पति जालंधर के प्रति अत्यंत पतिव्रता थीं। उनके तप और सतीत्व बल से देवता भी जालंधर को पराजित नहीं कर पा रहे थे।
देवताओं के निवेदन पर भगवान विष्णु ने जालंधर का वध करने के लिए छलपूर्वक वृंदा का सतीत्व भंग किया। जब वृंदा को यह ज्ञात हुआ, तो उन्होंने भगवान विष्णु को शाप दिया कि “आप पत्थर बन जाएंगे।”

भगवान विष्णु ने उनका शाप स्वीकार किया और शालिग्राम स्वरूप धारण किया। वृंदा के शरीर से एक पवित्र पौधा उत्पन्न हुआ — वही तुलसी थी। तब भगवान विष्णु ने कहा, “हे वृंदा! आज से तुम मेरे बिना नहीं रहोगी। जब-जब देव उठनी एकादशी आएगी, तब-तब मैं शालिग्राम रूप में तुम्हारे साथ विवाह करूंगा।”
तभी से तुलसी विवाह की परंपरा शुरू हुई।

तुलसी विवाह की विधि
तुलसी विवाह आमतौर पर देव उठनी एकादशी के दिन, या इस दिन न हो सके तो अगले दिन द्वादशी तिथि पर किया जाता है। विवाह में परिवार के सभी सदस्य शामिल होते हैं और इसे अत्यंत हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

सामग्री:
तुलसी का पौधा (विवाह के लिए तैयार किया गया)

शालिग्राम (भगवान विष्णु का प्रतीक)

पीला वस्त्र, मौली, चावल, हल्दी, रोली, फूल, दीपक, मिठाई, तुलसीदल

नारियल, पान, सुपारी, धूप, अक्षत, और पंचामृत

विधि क्रम:
स्नान और संकल्प: प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।

तुलसी सजावट: तुलसी के पौधे को साड़ी या चुनरी से सजाएं, गहनों और फूलों से अलंकृत करें। यह तुलसी माता का रूप होता है।

शालिग्राम स्थापना: पास में भगवान विष्णु (शालिग्राम) को पीले वस्त्र में सजाकर तुलसी के सामने रखें।

मंडप बनाना: तुलसी और शालिग्राम के बीच में एक छोटा मंडप बनाएं।

विवाह विधि:

पुजारी या परिवार के बुजुर्ग विवाह का संकल्प लेते हैं।

तुलसी माता के पिता के रूप में पूजा करने वाला व्यक्ति कन्यादान करता है।

मंगल गीत, आरती, और शंखनाद के साथ तुलसी और शालिग्राम का विवाह संपन्न किया जाता है।

विवाह के बाद प्रसाद वितरण होता है।

भोजन और दान: व्रती दिनभर व्रत रखकर शाम को तुलसी विवाह के पश्चात प्रसाद ग्रहण करते हैं। गरीबों को भोजन और वस्त्र दान करने की भी परंपरा है।

तुलसी विवाह का धार्मिक फल
शास्त्रों में कहा गया है कि तुलसी विवाह कराने से वही पुण्य प्राप्त होता है जो कन्यादान से होता है।
इस व्रत से घर में सुख-शांति बनी रहती है, दांपत्य जीवन में प्रेम बढ़ता है और समृद्धि का वास होता है।
जो व्यक्ति स्वयं विवाह नहीं कर पाता, उसके लिए तुलसी विवाह करवाना विशेष रूप से शुभ माना गया है।

समापन
देव उठनी एकादशी और तुलसी विवाह का यह पर्व भक्ति, पुनर्जागरण और शुभारंभ का प्रतीक है।
यह दिन न केवल भगवान विष्णु के जागरण का प्रतीक है, बल्कि भक्ति और प्रकृति के दिव्य मिलन का उत्सव भी है।
जब तुलसी और विष्णु का विवाह संपन्न होता है, तब पूरे ब्रह्मांड में शुभता और मंगल का संचार होता है।

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