- ashish nishad
- Oct 31, 2025
वात्सल्यमयी भगवती षष्ठीदेवी
#वात्सल्यमयी_भगवती_षष्ठीदेवी शिशुओंकी #अधिष्ठात्री हैं।
पुत्रहीन को सत्पुत्र देना,
संतान को दीर्घायु बनाना
तथा उसकी रक्षा करना भगवती षष्ठीका स्वाभाविक गुण है। मूलप्रकृतिके छठे अंशसे प्रकट होने से इनका षष्ठी नाम पड़ा है। ये ब्रह्माजीकी मानसपुत्री एवं शिव-पार्वतीके पुत्र स्कन्द [कार्तिकेय] की प्राणप्रिया हैं, देवसेना के नामसे भी ये विख्यात हैं। इन्हें विष्णुमाया तथा बालदा (पुत्र देनेवाली) कहा गया है। भगवती षष्ठीदेवी अपने योग के प्रभावसे शिशुओंके पास सदैव वृद्धामाताके रूपमें अप्रत्यक्षरूपसे विद्यमान रहती हैं तथा उनकी रक्षा एवं भरण-पोषण करती हैं। बालकोंको स्वप्नमें कभी खिलाती हैं, कभी हँसाती हैं, कभी रुलाती हैं और कभी दुलारती हैं। इस प्रकार अभूतपूर्व वात्सल्य प्रदान करती हैं।
स्वायंभुव मनुके पुत्र राजा प्रियव्रत थे। उनके कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यपजीने उनसे पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया, फलतः रानी मालिनी ने एक पुत्रको जन्म दिया, किंतु दुर्दैववश वह मरा हुआ था। राजा-रानी मरे पुत्रको देखकर महान् शोक में डूब गये। पुत्रशोक से उनका ज्ञानयोग (विवेक) जाता रहा। मंत्रियों के बहुत समझानेपर अन्तमें राजा पुत्रको लेकर श्मशान पहुँचे। इसी समय उन्होंने देखा कि स्फटिकमणि के समान एक दिव्य विमान अन्तरिक्षसे उतर रहा है और उस विमानमें श्वेत चम्पा पुष्पके समान एक देवी विराजमान हैं। देवीको अपने सामने उपस्थित देखकर राजाने हाथ जोड़ते हुए उनसे पूछा हे देवि! आप कौन हैं? तब देवीने बताया कि मैं ब्रह्माजीकी मानसी पुत्री षष्ठी (देवसेना) हूँ। मैं आप-जैसे पुण्यात्मा की इस स्थिति को देखकर यहाँ आयी हूँ। मैं अपुत्रको पुत्र देनेवाली, भार्याभिलाषीको प्रिय पत्नी देनेवाली, निर्धनोंको धन देनेवाली तथा कर्म करनेवालोंको उनके कर्म का फल देनेवाली हूँ
अपुत्राय पुत्रदाहं प्रियादात्री प्रियाय च ।
धनदाऽहं दरिद्रेभ्यः कर्मिभ्यश्च स्वकर्मदा ॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रखं० अ० ४३)
राजन्! सुख, दुःख, भय, शोक, हर्ष, मंगल, सम्पत्ति और विपत्ति- ये सब कर्मके अनुसार होते हैं। अपने ही कर्मके प्रभावसे पुरुष अनेक पुत्रों का पिता होता है और कुछ लोग पुत्रहीन भी होते हैं। किसीको मरा हुआ पुत्र होता है और किसीको दीर्घजीवी- यह कर्मका ही फल है। कर्म सबसे बलवान् है। इसलिये शोक का परित्याग कर सत्कर्मपरायण होना चाहिये। राजन्! मेरा दर्शन अमोघ है। यह बालक जैसे आप पति-पत्नी को प्रिय हैं, वैसे ही मुझे भी प्रिय है, इसकी रक्षा करना मेरा धर्म है। ऐसा कहते हुए उन देवीने बालकको उठाकर गोदमें रख लिया और अपनी कृपाशक्तिसे खेल-खेलमें ही उसे जिला दिया। वात्सल्यमूर्ति देवीकी गोदमें बालक मुस्कराते हुए उछलने लगा। यह देखकर राजाको अपार हर्ष हुआ।
देवीने राजासे कहा-'राजन्! तुम्हारा यह पुत्र सभी गुणों से युक्त, त्रिकालद्रष्टा तथा योगियों-तपस्वियोंमें भी सिद्ध पुरुष होगा। इसका नाम सुव्रत होगा। इसे पूर्वजन्म की सभी बातें याद रहेंगी।' इतना कहकर देवी उस पुत्रको लेकर आकाशमें जानेके लिये उद्यत हुई तो राजाने देवीकी प्रार्थना की, इसपर वे बोली -'राजन्! तुम मेरी सर्वत्र पूजा कराओ और स्वयं भी करो।' राजाद्वारा सहर्ष स्वीकृति देनेपर देवीने वह पुत्र राजाको सौंप दिया। देवीके आदेशसे राजा और प्रजाद्वारा षष्ठीदेवीका भव्य पूजन प्रारम्भ किया गया। इस प्रकार षष्ठीदेवी अत्यन्त कृपालु और दयालु हैं, उनकी कृपासे अपुत्रको पुत्र प्राप्त हो जाता है और मृतवत्साका पुत्र जीवित हो जाता है। अतः संतानप्राप्तिके लिये षष्ठीदेवीकी आराधना, उनके मंत्रका जप तथा उनके स्तोत्रका पाठ करना चाहिये।
संतानकामीको चाहिये कि वह शालग्राम शिला, कलश, वटवृक्षके मूलमें अथवा दीवारपर लाल चन्दनसे देवी षष्ठीकी आकृति बनाकर उनका पूजन करे। सर्वप्रथम देवीका इस प्रकार ध्यान करे
षष्ठांशां प्रकृतेः शुद्धां सुप्रतिष्ठाञ्च सुव्रताम् ।
सुपुत्रदां च शुभदां दयारूपां जगत्प्रसूम् ॥
श्वेतचम्पकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम् ।
परमां देवसेनां परां पवित्ररूपां परमां भजे।।
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रखं०४३।४९-५०)
अर्थात् मूलप्रकृतिके छठें अंशसे प्रादुर्भूत, शुद्धस्वरूप वाली, भलीभाँति प्रतिष्ठित, उत्तमव्रतोंसे सम्पन्न, श्रेष्ठ पुत्र देनेवाली, कल्याण प्रदान करनेवाली एवं दयाकी प्रतिमूर्ति ये देवी जगत्को उत्पन्न करनेवाली अर्थात् जगत्की माता हैं। श्वेत चम्पक पुष्पके समान इनका वर्ण है तथा ये रत्नमय आभषणोंसे विभूषित और पवित्रात्मा हैं। मैं ऐसी परम चित्स्वरूपिणी भगवती देवसेना (देवी षष्ठी) -का ध्यान करता हूँ। ध्यानके अनन्तर 'ॐ ह्रीं षष्ठीदेव्यै स्वाहा' इस अष्टाक्षर मंत्रसे आवाहन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्राभूषण, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्यादि उपचारोंसे देवीका पूजन करना चाहिये तथा देवीके अष्टाक्षर मंत्रका यथाशक्ति जप करना चाहिये। इस प्रकार भक्तिपूर्वक पूजन एवं जपके अनन्तर देवीके इस स्तोत्रका अत्यन्त भावपूर्वक पाठ करना चाहिये।
क्रमशः
आशीष निषाद
Leave a Comment
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!